करता हूँ दुआ रौशनी के लिए... काली बहुत तेरी ये रात है.
चलते हुए राहों पे यहाँ, मिलते है मुझे राही कई,
खामोशियों से ही होती है मगर, इस दिल में छुपी जो बात है.
ख़्वाबों में तो देखा सदा, वो आज जिसमे था सवेरा.
नींद खुलते क्यों फिर, और गहरा हो जाता, जो नाता अंधेरों के साथ है ?
कहते हैं सभी, होता नहीं, रुसवा कोई दर पे तेरे,
न जाने क्यों फिर, मायूस आब तक, विनती में जुड़े मेरे दो हाथ है ?
करता हूँ दुआ रौशनी के लिए... काली बहुत तेरी ये रात है.
डरता है क्यूँ मन, इन अंधेरों से तू ?
अँधेरा भोर की दुल्हन, संग बिदा हो जाएगा.
सूरज कि न होगी तुझको ज़रुरत,
बाती जो तू इक खुद में जलाएगा.
करता है दुआ रौशनी के लिए क्यूँ ?
देखे आस लगाये, क्यूँ सवेरे की बात है ?
सवेरा तो होता है बस इक तारे के दिख जाने से...
ज़रा देख गगन! इन अंधेरों में भी... तेरे संग हज़ारों तारों का साथ है!
My hindi teacher would have been really proud if I had written something remotely close to this masterpiece.
ReplyDeleteGreat hindi poets are a part of a dying breed that are slowly fading away into obscurity. I hope more youngsters take their mantle and run with an unprecedented vengeance to keep their flag flying high. Great stuff!!!
Thanks a lot Sujit.. Kind words you speak.. :)
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